कथनी और करनी में अंतर

एक व्यक्ति प्रसिद्ध कथा वाचक था और प्रतिदिन रामायण का पाठ करता था।

एक व्यक्ति प्रसिद्ध कथा वाचक था और प्रतिदिन रामायण का पाठ करता था। एक दिन कार्य वश पंडित जी को शहर जाना था उनके साथ उनका साथी भी था । रैलवे स्टेशन गांव से ५ किलोमीटर दूर था सुबह चार बजे रेलगाड़ी में चढ़ना था इसलिए स्नान करके सीधे स्टेशन पाउच गए ।सोचा पाठ गाडी में बैठ क्र क्र लूंगा। गाडी में चढ़ गए तो देखा कि डिब्बा बहुत ज्यादा भरा हुआ था कोई सीट खाली नई थी । गाडी चल दी कुछ देर बाद पंडित जी ने एक वयक्ति से बोलै आप सीट मुझे दे दो । मुझे रामायण का पाठ करना है आज गाडी पकड़ने क चक्कर में पाठ न कर पाया ।उसने सीट खाली कर दी और बोला मेरे अहो भाग्य की मुझे रामायण का पाठ सुनने को मिलेगा ।पण्डित जी ने बोलना शुरू किया प्रसंग था भरत जी अपने बड़े भाई के अधिकार के लिए राज्य को स्वीकार नई किया और जब तक राम जी वनवास से आये तो उनकी चरण पादुका राज गद्दी पैर रखी , और खुद जमीन पर बैठ कर राज्य का कार्य करने लगे । ओर जब रामजी अयोध्या आये तो उनको राज्य वापस कर दिया । भाई हो तो ऐसा ।
पाठ पूरा होने पर सबने पंडित जी की बहुत तारीफ की। एक वयक्ति को अपने बाप की बरसी पर पथ करवाना था लकिन कोई पंडित नई मिल रहा था। अगले दिन बरसी थी उसने पंडित जी से बहुत आग्रह किया कल आप अगर मेरे यहाँ पथ कर देंगे तो बड़ी किरपा होगी लकिन पंडित जी ने साफ़ मना कर दिया की मै पाठ नई कर सकता । पंडित जी बात को टाल रहे थे और सच्चाई नई बता रहे थे । तो उनका साथी बोला कि इन्होने अपने भाई पैर ५० गज जमीन के लिए केस कर रखा है ।जिसकी कल तारीख है और मै उसका गवाह हूँ वहाँ पर मौजूद सब लोग कहने लगे कि अपने कथा कितनी मार्मिक सुनाई है लेकिन अमल कतई नई करते है ।
“करनी तज कथनी कथे , अज्ञानी दिन रात ”
कुकुर ज्यो भौकत फिरे , सुनी सुनाई बात ।
अर्थात जो व्यक्ति औरो को शिक्षा देते है कि किसी का बुरा मत करो लेकिन खुद गलती करते है वे गुरु उस कुत्ते के सामान है जो व्यर्थ में भोंकता रहता है उसी प्रकार ये धर्म गुरु एक दूसरे से कथा सुनकर औरो को सुनते रहते है लेकिन खुद अमल नई करते ।

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